Financial Times की रिपोर्ट के अनुसार, अयातुल्लाह अली खामेनेई पर सटीक हमले से पहले तेहरान के कैमरों और मोबाइल नेटवर्क की कथित निगरानी की गई। दावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई की कथित मौत के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई सवाल उठ रहे हैं। इसी बीच लंदन स्थित अख़बार Financial Times की एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि इस्राइल ने वर्षों तक तेहरान के ट्रैफिक कैमरा नेटवर्क और मोबाइल सिस्टम में सेंध लगाकर उनकी गतिविधियों पर नजर रखी।
हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और न ही इस्राइल या ईरान की ओर से इस पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया आई है।
रिपोर्ट में मामले की जानकारी रखने वाले दो सूत्रों के हवाले से कहा गया है कि इस्राइली खुफिया एजेंसियों ने तेहरान के अधिकांश ट्रैफिक कैमरों तक कथित तौर पर पहुंच बना ली थी। बताया गया है कि इन कैमरों की लाइव फीड एन्क्रिप्ट कर सर्वरों तक भेजी जाती थी, जिससे सुरक्षा घेरे और मूवमेंट पैटर्न का विश्लेषण संभव हुआ।
एक विशेष कैमरा एंगल को कथित तौर पर अहम माना गया, जिससे हाई-सिक्योरिटी कंपाउंड के सामान्य हिस्से की झलक मिलती थी।
रिपोर्ट के मुताबिक, खुफिया एजेंसियों ने जटिल एल्गोरिदम और डाटा विश्लेषण तकनीकों का उपयोग कर सुरक्षा कर्मियों की ड्यूटी, मूवमेंट, रूट और संपर्कों का डिजिटल प्रोफाइल तैयार किया। खुफिया भाषा में इसे ‘पैटर्न ऑफ लाइफ’ कहा जाता है — यानी रोजमर्रा की गतिविधियों का विस्तृत नक्शा।
बताया गया है कि अरबों डाटा पॉइंट्स के विश्लेषण के लिए ‘सोशल नेटवर्क एनालिसिस’ तकनीक का उपयोग किया गया, जिससे निर्णय लेने की श्रृंखला और संभावित टारगेट्स की पहचान की जा सके।
रिपोर्ट में यह भी आरोप लगाया गया है कि पाश्चर स्ट्रीट के पास मौजूद कुछ मोबाइल टावरों के हिस्सों को बाधित किया गया, जिससे सुरक्षा टीम के फोन कॉल्स प्रभावित हुए। हालांकि, इस दावे की भी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि इस पूरी ‘इंटेलिजेंस पिक्चर’ को तैयार करने में इस्राइल की सिग्नल इंटेलिजेंस इकाई यूनिट 8200, मानव स्रोतों के जरिए काम करने वाली एजेंसी मोसाद और सैन्य खुफिया विश्लेषकों की भूमिका रही।
साथ ही यह भी दावा किया गया कि हमले से पहले सिग्नल इंटेलिजेंस के माध्यम से यह पुष्टि की गई कि संबंधित दिन सुबह सुप्रीम लीडर और वरिष्ठ अधिकारी उसी कंपाउंड में मौजूद थे। रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA के पास भी एक अलग मानव स्रोत था जिसने मौजूदगी की पुष्टि की।
गौरतलब है कि इन दावों पर अब तक किसी भी पक्ष की आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि रिपोर्ट में किए गए दावे सही साबित होते हैं, तो यह आधुनिक युद्ध में साइबर निगरानी, डिजिटल इंटेलिजेंस और डाटा विश्लेषण की बढ़ती भूमिका को दर्शाता है।
फिलहाल, अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजर इस मामले पर टिकी हुई है और आधिकारिक पुष्टि का इंतजार किया जा रहा है।