देहरादून में बिजली विभाग की कार्यप्रणाली पर फिर सवाल उठे हैं। जीटीएम निवासी बी.एन. पाण्डेय को मात्र 193 यूनिट खपत पर 81,603 रुपये का बिजली बिल भेजा गया, जिससे विभागीय लापरवाही उजागर हुई है।
देहरादून। राजधानी देहरादून में बिजली विभाग की कार्यप्रणाली एक बार फिर सवालों के घेरे में है। आए दिन उपभोक्ताओं को गलत और अत्यधिक बिजली बिल भेजे जाने की शिकायतें सामने आ रही हैं। ताजा मामला जीटीएम क्षेत्र के निवासी बी.एन. पाण्डेय से जुड़ा है, जिन्हें मात्र 193 यूनिट की खपत पर 81,603 रुपये का बिजली बिल थमा दिया गया।
बी.एन. पाण्डेय के अनुसार, उनकी औसत मासिक बिजली खपत 150 से 200 यूनिट के बीच रहती है। बावजूद इसके, बिजली विभाग ने 20 अगस्त 2025 से 31 दिसंबर 2025 की अवधि का 81,603 रुपये का बिल जारी कर दिया। बिल देखकर परिवार के होश उड़ गए।
पाण्डेय का आरोप है कि बिना किसी ठोस आधार के उन्हें फर्जी और अत्यधिक बिल थमा दिया गया। उन्होंने कई बार विभागीय अधिकारियों से शिकायत की, लेकिन शुरुआत में कोई संतोषजनक कार्रवाई नहीं की गई।
लगातार शिकायत के बाद विभाग ने पहले बिल घटाकर 58,440 रुपये किया और फिर इसे 51,143 रुपये कर दिया। हालांकि, उपभोक्ता का कहना है कि जब उनकी खपत सामान्य रही है और वे हर महीने समय पर भुगतान करते आए हैं, तो इतनी बड़ी राशि का बिल बनना ही अपने आप में विभागीय लापरवाही को दर्शाता है।
बिजली विभाग का कहना है कि पिछले दो वर्षों से उपभोक्ता का मीटर खराब था, जिसके कारण 450 से 600 यूनिट तक की खपत दर्ज हो रही थी। लेकिन हैरानी की बात यह है कि अब वही विभाग उसी मीटर को सही बताते हुए बकाया बिल के भुगतान का दबाव बना रहा है।
सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि यदि मीटर दो वर्षों से खराब था, तो उसे बदलने की जिम्मेदारी किसकी थी? क्या यह जिम्मेदारी उपभोक्ता की थी या विभाग की?
एक ही मीटर को पहले खराब बताना और फिर उसी की रीडिंग को सही मानकर भारी-भरकम बिल थमा देना विभागीय कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े करता है।
पाण्डेय का कहना है कि विभाग की इस लापरवाही ने उन्हें मानसिक और आर्थिक रूप से परेशान कर दिया है। उनके अनुसार, घर में कभी भी इतनी अधिक बिजली खपत नहीं हुई, फिर भी विभाग अपनी मनमानी पर अड़ा हुआ है।
यह मामला केवल एक उपभोक्ता तक सीमित नहीं है, बल्कि बिजली विभाग की कार्यप्रणाली पर व्यापक सवाल उठाता है। यदि समय रहते ऐसे मामलों की निष्पक्ष जांच नहीं की गई, तो आम जनता में असंतोष और भय का माहौल और गहरा सकता है।
अब देखना यह होगा कि संबंधित अधिकारी इस मामले में क्या ठोस कदम उठाते हैं और क्या उपभोक्ता को न्याय मिल पाता है या नहीं।