नैनीताल। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि किसी चालक के मुंह से शराब की गंध आने मात्र से उसे नशे की हालत में वाहन चलाने का दोषी नहीं माना जा सकता....
नैनीताल। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि किसी चालक के मुंह से शराब की गंध आने मात्र से उसे नशे की हालत में वाहन चलाने का दोषी नहीं माना जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में रक्त परीक्षण (ब्लड टेस्ट) या ब्रेथ एनालाइजर टेस्ट जैसे वैज्ञानिक साक्ष्य आवश्यक हैं, जिनसे यह सिद्ध हो सके कि चालक के शरीर में शराब की मात्रा कानून द्वारा निर्धारित सीमा से अधिक थी।
यह टिप्पणी बदरीनाथ धाम से चमोली जा रही एक जीप के दुर्घटनाग्रस्त होने से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान की गई। न्यायालय ने कहा कि केवल शराब की गंध के आधार पर नशे में वाहन चलाने का आरोप तय करना विधिसम्मत नहीं है और अभियोजन को आरोप सिद्ध करने के लिए वैज्ञानिक एवं विश्वसनीय साक्ष्य प्रस्तुत करने होंगे।
इसी आधार पर हाईकोर्ट ने भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 105 के तहत तय आरोप को निरस्त कर दिया। हालांकि, मामले में अन्य संबंधित धाराओं के तहत चल रही न्यायिक कार्रवाई को बरकरार रखा गया है।
अपने निर्णय में हाईकोर्ट ने कहा कि किसी भी आपराधिक मामले में दोष निर्धारित करने का आधार केवल अनुमान या आशंका नहीं, बल्कि ठोस एवं वैज्ञानिक साक्ष्य होने चाहिए। न्यायालय के इस फैसले को भविष्य में नशे में वाहन चलाने से जुड़े मामलों की जांच और अभियोजन प्रक्रिया के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।